भवानीमंडी / जगदीश पोरवाल /प्रतिशोध की आग जब किसी मनुष्य के भीतर धधकती है, तो वह सही-गलत, आगे-पीछे, परिणाम—कुछ भी नहीं देखता। उस समय उसे केवल अपना “हिसाब” दिखाई देता है। लेकिन इतिहास और वर्तमान—दोनों गवाही देते हैं कि बदले की भावना अंततः विनाश ही लाती है।
यदि मनुष्य क्षणिक आवेग पर नियंत्रण कर ले, तो कई घर उजड़ने से बच सकते हैं। प्रतिशोध कभी न्याय नहीं देता, वह केवल नई पीड़ा को जन्म देता है।
महाभारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वह केवल एक युद्ध नहीं था—वह प्रतिशोध की ज्वाला थी, जिसने अंततः समूचे कुल का सर्वनाश कर दिया।
अकलेरा की घटना: जब “हिसाब” ने पाँच मासूमों का भविष्य छीन लिया:-
जिला पुलिस अधीक्षक अमित कुमार बुडानिया के अनुसार तीन दिन पूर्व झालावाड़ जिले के अकलेरा क्षेत्र के मदनपुरिया गांव में एक हृदय विदारक घटना सामने आई। सूचना मिली कि एक व्यक्ति की नृशंस हत्या कर दी गई है।
पुलिस मौके पर पहुँची तो दृश्य भयावह था। मृतक कालूलाल था—वही कालूलाल जिसे कुछ वर्ष पूर्व भेरूलाल की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सजा काटकर वह हाल ही में गांव लौटा था। उसके शरीर पर धारदार हथियारों के गहरे घाव थे—मानो वर्षों से सुलग रही रंजिश ने आज रक्तरंजित रूप ले लिया हो।
पुलिस के सामने सवाल था—
“हत्या किसने की?”
गांव में फुसफुसाहट थी—
“यह हत्या नहीं, हिसाब है…”
बदले का चक्र: एक मौत का जवाब दूसरी मौत:-
कुछ वर्ष पूर्व भेरूलाल की हत्या हुई थी। वह अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला बेटा था। पीछे बूढ़ा पिता, पत्नी, दो मासूम बच्चे और तीन बहनें थीं।
अब खुलासा हुआ कि भेरूलाल की पत्नी कालीबाई, बहन केदारबाई, प्रेमबाई सहित अन्य लोगों ने कालूलाल की हत्या कर दी।
उन्होंने सोचा—
“हम न्याय कर रहे हैं।”
पर क्या सचमुच यह न्याय था?
पाँच बच्चों का अंधकारमय भविष्य:-
इस एक निर्णय ने पाँच मासूम बच्चों का जीवन अंधकार में धकेल दिया।
कालीबाई के दो छोटे बच्चे
प्रेमबाई के तीन बच्चे
बूढ़ा पिता—जो दादा भी है, नाना भी
अब वह वृद्ध व्यक्ति नहीं जानता—
वह बच्चों की फीस कैसे भरेगा?
रोजी-रोटी कैसे जुटाएगा?
अदालतों की तारीखों का खर्च कहाँ से लाएगा?
केदारबाई, जिसने बीएससी-बीएड कर प्राइवेट योगा टीचर के रूप में जीवन सँवारा था—आज स्वयं कानूनी संकट में है।
एक पल के आवेग ने केवल कालूलाल की जान नहीं ली—
उसने पूरे परिवार की रोशनी बुझा दी।
प्रतिशोध न्याय नहीं, विनाश देता है:-
हत्या किसने की और किसकी हुई—यह कानून तय करेगा।
परंतु एक गहरी सच्चाई सामने है—
इस घटना में केवल एक व्यक्ति नहीं मरा।
यहाँ कई सपनों की हत्या हुई है।
यहाँ पाँच बचपन घायल हुए हैं।
यहाँ एक वृद्ध की असहायता की हत्या हुई है।
प्रतिशोध की ज्वाला में झोंककर इंसान समझता है कि उसने “हिसाब बराबर” कर लिया, पर वास्तव में वह अपने ही भविष्य को राख कर देता है।
समाज के लिए संदेश:-
क्रोध क्षणिक होता है,पर उसके परिणाम स्थायी होते हैं।
यदि पीड़ा का उत्तर पीड़ा से दिया जाएगा, तो यह सिलसिला कभी समाप्त नहीं होगा। कानून का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन वही सभ्य समाज की पहचान है।
हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि बदला नहीं, संवाद और कानून ही समाधान हैं।
वरना हर गांव में एक नया “महाभारत” जन्म लेता रहेगा।
प्रतिशोध से कोई विजेता नहीं बनता—सब हारते हैं।
