मल्हारगढ़ / पिपलियामंडी (गोपाल मालेचा) मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री व क्षेत्रीय विधायक जगदीश देवड़ा के निर्वाचन क्षेत्र मल्हारगढ़ के अंतर्गत आने वाली नगर परिषद पिपलियामंडी में करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि जिस भूमि का मालिकाना हक उच्च न्यायालय (Indore Bench) में विचाराधीन है, उसे नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि मिलीभगत कर निजी हाथों में सौंपने और अवैध लाभ कमाने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?- विवाद की जड़ 'लाला काशीराम' को वर्ष 1940 में उद्योग लगाने हेतु आवंटित की गई पट्टे की भूमि (सर्वे क्रमांक 116, 117, 118) है। पट्टे की शर्तों का उल्लंघन होने पर वर्ष 2005 में तत्कालीन कलेक्टर मंदसौर ने धारा 182(2) के तहत पट्टा निरस्त कर भूमि को शासन के नाम दर्ज करने का आदेश दिया था। तहसीलदार मल्हारगढ़ ने 13 अप्रैल 2005 को इस जमीन का विधिवत कब्जा प्राप्त कर पंचनामा भी तैयार किया था।
न्यायालय में उलझा पेंच- इस भूमि को लेकर शासन और पट्टाधारी के वारिसों के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली। सिविल न्यायालय के एक फैसले के विरुद्ध नगर परिषद पिपलियामंडी ने स्वयं हाईकोर्ट में अपील (F.A.-05/2013) दायर की थी, जो वर्तमान में न्यायालय में लंबित है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक हाईकोर्ट से अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक इस भूमि की स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
नगर परिषद की भूमिका पर गंभीर सवाल- हैरानी की बात यह है कि जिस भूमि पर नगर परिषद का कोई मालिकाना हक (Ownership) नहीं है, उस पर परिषद द्वारा वर्तमान में दुकानों का हेर-फेर और नए सिरे से टैक्स रसीदें काटने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन:- राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार भूमि शासन के अधीन है, परिषद को इसे आवंटित करने या व्यावसायिक उपयोग करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट में उदासीनता:-आरोप है कि मुख्य नगरपालिका अधिकारी और अध्यक्ष जानबूझकर हाईकोर्ट में चल रहे प्रकरण में रुचि नहीं ले रहे हैं, ताकि मामले को लटकाकर जमीन को खुर्द-बुर्द किया जा सके।
जनता की मांग:-खेल मैदान या सार्वजनिक उपयोग स्थानीय नागरिकों और जागरूक वर्ग का कहना है कि पिपलियामंडी में एक भी व्यवस्थित खेल मैदान नहीं है। करोड़ों की इस बेशकीमती जमीन को निजी स्वार्थ के लिए लुटाने के बजाय, यहाँ खेल मैदान या सार्वजनिक पार्क विकसित किया जाना चाहिए, जिससे पर्यावरण और आम जनता को लाभ मिल सके।
"जब शासन ने जमीन का कब्जा ले लिया है और मामला न्यायालय में है, तो नगर परिषद द्वारा टैक्स रसीदें काटना और मालिकाना हक जताना सीधे तौर पर पद का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार है।"
मुख्य बिंदु जो प्रशासन के लिए जांच का विषय हैं: बिना आवंटन के नगर परिषद शासकीय भूमि पर टैक्स रसीदें कैसे काट रही है? हाईकोर्ट में लंबित प्रकरण (F.A.-05/2013) के बावजूद भूमि के स्वरूप से छेड़छाड़ क्यों की जा रही है? क्या उपमुख्यमंत्री के क्षेत्र में शासकीय संपत्ति की सुरक्षा के प्रति प्रशासन गंभीर है?
