उच्च न्यायालय में लंबित प्रकरण के बावजूद टैक्स रसीदें कैसे हुई जारी?
पिपलियामंडी। नगर के मुख्य मार्ग पर स्थित स्व. लाला काशीराम की सिलेट पेंसिल कारखाने वाली जीर्ण भूमि पर बनी लगभग 16 दुकानों की टैक्स रसीदें नगर परिषद द्वारा जारी किए जाने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, नगर परिषद की इस कार्रवाई के बाद नगर में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है, नगर के बीचों-बीच स्थित करोड़ों रुपये मूल्य की इस बेशकीमती जीर्ण भूमि पर वर्षों से निर्माणित दुकानें पर कब्जा किया हुआ है, अब इन दुकानों की टैक्स रसीदें काटे जाने की जानकारी सामने आई है, सूत्रों के अनुसार, टैक्स रसीद जारी होने के बाद इन्हीं रसीदों को आधार बनाकर कब्जाधारियों के नाम नामांतरण की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी की जा रही है? टैक्स रसीद को स्वामित्व का प्रमाण बताकर मालिकाना हक देने का प्रयास किया जा रहा है, जो नियमों के विपरीत है?

जिस भूमि को न्यायालय में शासकीय माना, उसी की टैक्स रसीद?
उल्लेखनीय है की उक्त भूमि को पूर्व सांसद एवं स्वतंत्रता सेनानी स्व. लाला काशीराम को सिलेट पेंसिल कारखाना उद्योग संचालित करने हेतु पट्टे पर दिया गई थी, लेकिन निर्धारित उद्देश्य के विपरीत, कारखाना संचालित न कर वहां दुकानों का निर्माण कर दिया गया था, पट्टे की ज़मीन कारखाना न संचालित करते हुवे दुकानों का निर्माण किया एवं पट्टे पर दीगई भूमि पर शासन की शर्तों के उल्लंघन के बाद यह मामला न्यायालय पहुंचा जो वर्तमान में भी उच्च न्यायालय इंदौर में विचाराधीन है, जब यह प्रकरण अभी भी न्यायालय में लंबित है, उच्च न्यायालय का कोई अंतरिम आदेश भी पारित नहीं हुआ है, तो ऐसे में नगर परिषद द्वारा टैक्स रसीदें जारी करना और नामांतरण की प्रक्रिया शुरू करना नगर परिषद की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहा है? जब उक्त भूमि पर न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक नगर परिषद को भूमि से संबंधित कोई भी निर्णय लेने का अधिकार नहीं है ।

मिलीभगत के आरोप, अंदरखाने बनी सहमति?- मामले में यह भी आरोप लग रहे हैं कि पक्ष-विपक्ष के कथित मिलीभगत से नामांतरण को आसान बनाने की अंदरखाने सहमति बनाई गई है, ताकि भविष्य में भूमि का लेन-देन किया जा सके यदि ऐसा हुआ, तो यह उच्च न्यायालय एवं शासन के नियमों का खुला उल्लंघन होगा, बल्कि नगर परिषद की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होंगे?
टैक्स रसीद के साथ नामांतरण का वादा?
सूत्र बताते हैं कि टैक्स रसीद जारी करने के बाद दुकानदारों को मालिकाना हक दिए जाने का आश्वासन भी दिया गया है, इससे नगर परिषद की टैक्स नीति, भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं, एवं नगर परिषद अधिकारियों और अवैध कब्जाधारियों के बीच आर्थिक लेन-देन हुआ है?, और पूरे मामले में एक बिचौलियों की भूमिका भी सामने आ रही है जिसनें कि क्षेत्र के कुछ पत्रकारों को “हैंडल” करने के लिए मोटी राशि लिये जाने की चर्चा भी है? अब देखना यह है कि उच्च न्यायालय में लंबित इस गंभीर मामले पर प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी क्या कार्रवाई करते हैं।
