आलोट/दुर्गाशंकर पहाड़िया/ परमात्मा सर्वशक्तिमान हैं, लेकिन मनुष्य स्वयं को बड़ा सिद्ध करने में लगा रहता है, जबकि सृष्टि का सत्य यह है कि साढ़े पांच हजार से अधिक नदियां बहकर समुद्र को बड़ा बनाती हैं, धरती और आकाश को विशाल बताती हैं और भगवान अपने भक्त को बड़ा बताते हैं। इसलिए वही व्यक्ति बड़ा है, जिसके हृदय में भगवान विराजमान हों। यह भाव होना ही भक्ति का सार है।
ये विचार गुरुदेव संतश्री पं. कमलकिशोरजी नागर ने आलोट से करीब 18 किलोमीटर दूर बड़ौद रोड स्थित श्रीकृष्ण गौशाला परिसर में ग्राम माल्या के धर्मप्रिय ग्रामवासियों द्वारा आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन बुधवार को व्यक्त किए।
संतश्री ने भाव और श्रद्धा का महत्व समझाते हुए कहा कि जैसे सोने-चांदी का भव्य सिंहासन बना भी लिया जाए, लेकिन यदि मूर्ति टिकाने के लिए गादी न हो तो वह हिलती-डोलती रहती है। उसी प्रकार जब तक मनुष्य के हृदय में भाव नहीं बढ़ता, तब तक उसका मन भी स्थिर नहीं होता। कथा का उद्देश्य ही हृदय में भाव जगाना है।
उन्होंने कहा कि राम से बड़ा उनका नाम है और श्रीकृष्ण से बड़ी उनकी कथा है। इसी तरह नारी से बड़ा उसका सुहाग होता है। संगति पर बल देते हुए संतश्री ने कहा कि क्रोधी और लोभी के साथ बैठने से वही अवगुण स्वयं में भी आ जाते हैं, इसलिए ऐसी संगति से बचना चाहिए।
संतश्री ने उदाहरणों के माध्यम से बताया कि शबरी के प्रेमभाव के कारण भगवान श्रीराम ने उसके बेर स्वीकार किए, सूरदास तर गए और यहां तक कि भगवान को सौ गाली देने वाले को भी परमात्मा ने मुक्ति प्रदान की। परमात्मा इतने दयालु हैं कि प्रेमभाव से अंधे, गूंगे, बहरे, लूले-लंगड़े और बुद्धिहीन तक को तार देते हैं।
उन्होंने कहा कि संकट के समय मनुष्य का भगवान के प्रति भाव कम हो जाना उचित नहीं है। जैसे रोहिणी नक्षत्र की तपन अधिक होगी तो ही फसल अच्छी होगी, यह बात किसान भली-भांति समझता है। इसी प्रकार भगवान के प्रति हमारा भाव भी ब्याज की गति से बढ़ना चाहिए।
सामाजिक जीवन पर टिप्पणी करते हुए संतश्री ने कहा कि आज लोग सुनना पसंद नहीं करते, इसी कारण भाई-भाई की, बेटा पिता की, बहु सास की और नौकर मालिक की बात नहीं सुनता, जिससे कलह बढ़ता है। यदि हम सुनना शुरू कर दें और जवाब देना बंद कर दें तो पुलिस थाना और अदालतें स्वयं बंद हो जाएंगी। इसलिए ऐसा बोलना चाहिए जिससे सामने वाले के मन में आग न लगे।
कथा वाचन से पूर्व बालसंत गोविंदजी ने भी उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रवचन दिए। कथा स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और संगीतमय भागवत कथा का भावविभोर होकर श्रवण किया।