आलोट/दुर्गाशंकर पहाड़िया । ताल रोड स्थित डबल लॉक संस्था के सरकारी गोदाम के बाहर यूरिया की ब्लैक मार्केटिंग ने पूरे सिस्टम की परतें उधेड़कर रख दीं। सरकारी रेट 267 रुपये की यूरिया 350 में खुलेआम बेची जा रही थी, और यह सब उसी गोदाम के बाहर हो रहा था जहाँ किसानों को सरकारी दर पर खाद मिलनी चाहिए थी। सवाल यह है कि गोदाम संचालक, कर्मचारी और निगरानी करने वाले अधिकारी आखिर कर क्या रहे थे?
शिकायत मिलने पर एसडीएम रचना शर्मा के निर्देश पर राजस्व विभाग की टीम ने अचानक निरीक्षण किया। तहसीलदार पंकज पवैया टीम के साथ पहुँचे तो टेंपो में चार बोरियाँ यूरिया और पीओएस मशीन मिली। संस्था का कर्मचारी कैलाश बैरागी मौके पर ही ब्लैक में खाद बेचते रंगे हाथ पकड़ा गया। खाद जब्त हुई, पंचनामा हुआ, दस्तावेज तैयार हुए — लेकिन इसके बावजूद गोदाम प्रबंधन और निगरानी तंत्र की भूमिका पर सबसे बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
किसानों ने साफ कहा कि यह कोई एक दिन की घटना नहीं है। लंबे समय से कर्मचारी किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर ब्लैक का खेल चला रहे थे। रबी सीजन में गेहूं बोनी का समय है, किसान रात दो बजे लाइन में लगते हैं, शाम तक खड़े रहते हैं और फिर भी खाली हाथ लौटते हैं। सोसाइटी की खिड़कियों पर ताले लटके रहते हैं, लेकिन बाहर ब्लैक में यूरिया आसानी से मिल जाती है। किसानों का तंज है कि स्टॉक “खत्म” बताने वाले कर्मचारी, संचालक और अधिकारी ब्लैक में बिक रही खाद को क्या देखने से भी अंधे हो गए थे?
भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि क्षेत्र में यूरिया की वास्तविक मांग का सही लेखा-जोखा तैयार न करना और ऊपरी अधिकारियों को वास्तविक स्थिति से अनजान रखना भी इसी व्यवस्था की मिलीभगत का हिस्सा है। यदि रिपोर्टें दबाई जाएँगी और स्टॉक का सही हिसाब नहीं भेजा जाएगा, तो किसान लाइन में खड़े रहेंगे और ब्लैक का खेल चलता रहेगा।
किसानों का कहना है कि यह मामला किसी एक कर्मचारी की हरकत नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की ढीलाई और पर्देदारी का संकेत है। गोदाम संचालक की जिम्मेदारी तय हो, कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई हो और अधिकारियों के स्तर पर भी जवाबदेही तय की जाए — तभी इस गोरखधंधे पर रोक लगेगी।
किसान संघ ने चेतावनी दी है कि यदि अब भी स्थिति नहीं बदली, तो बड़ा आंदोलन तय है और इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह प्रशासन पर होगी। किसानों का साफ कहना है — सिस्टम ईमानदार होता तो सरकारी गोदाम के बाहर ब्लैक का धंधा पनप ही नहीं सकता था।
